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Guava Farming: सुल्तानपुर का ये किसान पारंपरिक खेती छोड़ अमरूद की खेती कर रहा है और इससे उन्हें मोटा मुनाफा भी हो रहा है.
किसान राम अछैबर मौर्य
हाइलाइट्स
- राम अछैबर मौर्य ने अमरूद की खेती से लाखों की कमाई की.
- कम लागत में अमरूद की खेती से अच्छा मुनाफा हो रहा है.
- जिला उद्यान विभाग से अमरूद की खेती का प्रोत्साहन मिला.
सुल्तानपुर. भारत कृषि के क्षेत्र में तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है. ऐसे में पारंपरिक खेती को छोड़कर किसान वैज्ञानिक खेती की ओर आगे बढ़ रहे हैं. इसी कड़ी में आज हम बात करने वाले हैं उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के एक ऐसे किसान के बारे में, जिन्होंने आधुनिक विधि से अमरूद की खेती की और आज लाखों रुपए की कमाई कर रहे हैं. इनका नाम है राम अछैबर मौर्य. जानते हैं इनकी सफलता का क्या है राज.
कैसे हुई शुरुआत
सुल्तानपुर जिले की बालमपुर ग्राम सभा के रहने वाले किसान राम अछैबर मौर्य ने लोकल 18 से बातचीत के दौरान बताया कि उन्होंने पारंपरिक फसल, धान और गेहूं को छोड़कर अमरूद की खेती की शुरुआत की, जिसमें उनको कम लागत में अच्छा मुनाफा होने लगा. इससे वह अब अपने अधिकतम खेतों में अमरूद की ही खेती कर रहे हैं. राम अछैबर ने बताया कि एक हेक्टेयर खेत में उन्होंने 1100 पौधे लगाए, जिसमें तैयार होने तक उनकी लागत 1 लाख रुपए आई और उन्होंने 3 लाख रुपए का अमरूद बेचा. इससे उन्हें अमरूद की खेती में काफी फायदा हो रहा है.
सहयोग भी मिला
किसान राम अछैबर मौर्य ने बताया कि उन्हें अमरूद की खेती करने का प्रोत्साहन जिला उद्यान विभाग से मिला. उन्हें केले का पौधा लगाने के लिए सरकार ने सब्सिडी भी उपलब्ध करवाई है, जिसके लिए उन्होंने जिला उद्यान अधिकारी रणविजय सिंह और सहायक उद्यान निरीक्षक दिनेश सिंह को सहयोग के लिए धन्यवाद भी प्रेषित किया.
साथ में उगती है ये फसल
लोकल 18 से बातचीत के दौरान किसान राम अछैबर मौर्य ने बताया कि अमरूद का पौधा जुलाई माह में लगाया जाता है और लगभग 13-14 महीने बाद इसमें फल तैयार हो जाता है. इस फसल के तैयार होने की कुल अवधि 15 महीने की है. इसके साथ ही इसमें केले की फसल भी उगाई जाती है.
एक पेड़ में कितना फल
राम अछैबर के लगाए गए अमरूद के पौधों में प्रति पौधा औसतन 4 से 5 किलो फल होता है, जो एक घरिया में तैयार अमरूद का औसत मानक है. वहीं, बाजार में किसान जब इसे बेचने जाते हैं तो दर्जन में गिनती न करके बल्कि वजन में तौला जाता है. ये हर साल औसतन 4 हजार रुपए प्रति कुंतल के हिसाब से बेचा जाता है.