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Friday, April 4, 2025

यूपी के इस गांव को मिला है वरदान, यहां सांप के काटने से भी नहीं होती मौत

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सहारनपुर: धार्मिक मान्यताओं से सहारनपुर जनपद घिरा हुआ है. देशभर से श्रद्धालु सहारनपुर जनपद में पहुंचकर विभिन्न मंदिरों में पूजा पाठ करते हैं. ऐसा ही एक मंदिर सहारनपुर जनपद के महाभारत कालीन गांव जड़ौदा पांडा में स्थित है जहां पर देशभर से लोग आते हैं. गांव जड़ौदा पांडा में स्थित बाबा नारायण दास मंदिर की महत्ता देशभर में है.

बाबा के वंश से जुड़े 12 गांवों जड़ौदा पांडा, किशनपुरा, जयपुर, शेरपुर, घिसरपड़ी, किशनपुर, चरथावल, खुशरोपुर, मोगलीपुर, चोकड़ा, घिस्सूखेड़ा, न्यामू के ग्रामीण उनको अपना देवता मानते हैं. इन गांवों पर बाबा नारायण दास की ऐसी कृपा बनी हुई है कि यहां पर अगर किसी को कोई सांप काट लेता है, तो उनको सांप के काटने का जरा भी असर नहीं होता और न ही उनकी मौत होती है.

बाबा करते हैं भक्तों की मनोकामनाएं पूरी

लोगों का कहना गई कि लगभग 700 साल पूर्व ग्राम जड़ौदा पांडा निवासी उग्रसेन और माता भगवती के घर बाबा नारायण दास का जन्म हुआ था. बाबा नारायण दास भगवान शिव के भक्त थे और उन्होंने विभिन्न स्थानों पर जाकर तपस्या की उन्होंने अपनी 80 बीघा जमीन शिव मंदिर में दान दी और महाभारत कालीन शिव मंदिर के पास साधना के दौरान वह अपने सेवक, घोड़े, कुत्ते के साथ धरती माँ की गोद मे समा गए थे. जहां उनकी समाधि बना दी गई थी जो कि आज भी मौजूद है और इस समाधि पर दूर-दूर से लोग अपनी मनोकामनाओं को लेकर आते हैं और उनकी मनोकामनाओं को बाबा नारायण दास पूर्ण भी करते हैं.

12 गांव के किसी भी व्यक्ति को सांप के काटने का नहीं चढ़ता जहर

ग्रामीण पंडित पंकज शर्मा ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि जो इस गांव के मूल निवासी हैं. ऐसा हमने आज तक नहीं सुना कि उनको सांप ने काटा और उनकी मौत हो गई, क्योंकि बाबा नारायण दास की 12 गांवों पर असीम अनुकंपा और कृपा है. सांप के काटने के बाद उनको किसी भी प्रकार की दवाई की आवश्यकता नहीं पड़ती. बाबा नारायण दास का समाधि स्थल यहां है और बाबा नारायण दास इस गांव की एक दिव्य शक्ति है. लगभग 700 साल पहले बाबा नारायण दास ने यहां पर समाधि ली थी प्रतिदिन यहां पर लोग बड़े ही सेवा भाव से पहुंचते हैं.

शिव भक्त थे बाबा

बाबा नारायण दास के मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां पहले बांस का वन हुआ करता था जहां पर बाबा ने समाधि ली थी जिसको जुड़ कहा जाता था. इसी कारण से इसको जुड़ मंदिर भी कहा जाता है. बाबा नारायण दास श्री पंचायती उदासीन अखाड़े से जुड़े हुए थे और शिव भक्त थे. बाबा नारायण दास ने दूर-दूर तपस्या की और अपने गांव में आकर समाधि ली थी. प्रत्येक वर्ष यहां पर आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष में रविवार को विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है.



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