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Raebareli: खेतों की मेड़ पर ये पेड़ उगाकर किसान कुछ सालों में मोटा मुनाफा कमा सकते हैं. ये फसल के लिए भी अच्छे होते हैं और सही ग्रोथ होने पर लाखों में कमाई कराते हैं.
यूकेलिप्टस पेड़ के फायदे
हाइलाइट्स
- यूकेलिप्टस के पेड़ से किसान मोटा मुनाफा कमा सकते हैं.
- यूकेलिप्टस की लकड़ी का उपयोग फर्नीचर और औद्योगिक इकाइयों में होता है.
- यूकेलिप्टस के पौधे 6 साल में तैयार हो जाते हैं.
रायबरेली. अगर आप खेती-किसानी के साथ अतिरिक्त कमाई करना चाहते हैं, तो कृषि विशेषज्ञ की यह सलाह आपके लिए फायदेमंद हो सकती है. आमतौर पर किसान अपने खेतों में फसल लगाते हैं, लेकिन मेड़ खाली पड़ी रहती है. इसी खाली मेड़ पर यूकेलिप्टस के पौधे लगाकर किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं. आज इस बारे में ही डिटेल में जानते हैं कि इसकी प्रक्रिया क्या होती है, इसे कैसे उगाया जाता है और कितना मुनाफा होता है.
यूकेलिप्टस से मुनाफा और उपयोगिता
रायबरेली के राजकीय कृषि केंद्र के प्रभारी अधिकारी कृषि, शिव शंकर वर्मा, जो डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद से जुड़े हैं, ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि किसान अपनी फसल के साथ यूकेलिप्टस के पौधे लगाकर अच्छी कमाई कर सकते हैं. इसकी लकड़ी का उपयोग फर्नीचर, औद्योगिक इकाइयों और घरेलू सामान बनाने में किया जाता है.
विदेशी मूल का पौधा
शिव शंकर वर्मा बताते हैं कि यूकेलिप्टस का पौधा मूलत: ऑस्ट्रेलिया का है और यह तेजी से बढ़ता है. इसे अन्य फसलों के साथ आसानी से उगाया जा सकता है, जिससे कम लागत में अधिक मुनाफा संभव हो जाता है. इसे विभिन्न क्षेत्रों में गम, सफेदा और नीलगिरी के नाम से भी जाना जाता है.
यूकेलिप्टस की लकड़ी का इस्तेमाल
इसकी लकड़ी का उपयोग इमारती सामान, ईंधन, पेटियां, हार्ड बोर्ड, लुगदी, फर्नीचर और पार्टिकल बोर्ड बनाने में किया जाता है. किसान इसे मेड़ या खाली पड़ी जमीन पर लगाकर अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं.
यूकेलिप्टस का रोपण विधि
यूकेलिप्टस के पौधे को लगाने के लिए 1 मीटर चौड़ा, 1 मीटर लंबा और 1 मीटर गहरा गड्ढा खोदें. इसमें एक तिहाई मिट्टी, एक तिहाई गोबर की सड़ी हुई खाद और समान मात्रा में बालू मिलाकर उसमें फफूंदनाशक मिलाएं. गड्ढे में मिट्टी भरते समय 1 किलोग्राम एनपीके खाद का उपयोग करें. पौधों के बीच 2 मीटर की दूरी रखें.
6 सालों में तैयार हो जाता है पेड़
यूकेलिप्टस का पौधा रोपाई के 6 वर्षों बाद पूरी तरह तैयार हो जाता है. इसके लिए किसी अतिरिक्त खर्च की जरूरत नहीं पड़ती है और इसे सह फसली खेती के रूप में अपनाया जा सकता है. इसे खेत की मेड़ पर लगाने से दूसरी फसलों को कोई नुकसान नहीं होता है.