नहीं रहे भारत को हॉकी में लगातार 3 ओलंपिक गोल्ड मैडल दिलवाने वाले बलबीर सिंह दोसांझ

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नहीं रहे भारत को हॉकी में लगातार 3 ओलंपिक गोल्ड मैडल दिलवाने वाले बलबीर सिंह दोसांझ
नहीं रहे भारत को हॉकी में लगातार 3 ओलंपिक गोल्ड मैडल दिलवाने वाले बलबीर सिंह दोसांझ

चंडीगढ़ न्यूज़ : भारत को हॉकी में लगातार 3 ओलंपिक गोल्ड मैडल दिलवाने वाले पूर्व ओलंपियन व हॉकी लीजैंड बलबीर सिंह दोसांझ (सीनियर) दुनिया को अलविदा कह गए। 96 वर्षीय बलबीर सिंह सीनियर को 12 मई को सुबह दिल का दौरा पड़ा था। वह मोहाली के फोर्टिस अस्पताल में आई.सी.यू. में भर्ती थे और उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था जहां उनकी हालत नाजुक बनी हुई थी। बुधवार सुबह भी उन्हें दो बार फिर अटैक आया था। तब से उनकी हालत में कुछ सुधार नहीं दिखा था। कई अंगों के प्रभावित होने के कारण 8 मई को उन्हें चंडीगढ़ सैक्टर-36 स्थित उनके आवास से अस्पताल ले जाया गया था। (वह अपनी बेटी सुखबीर के साथ रहते हैं) जिसके बाद उनकी हालत में थोड़ा सुधार हुआ था लेकिन 12 मई को दिल का दौरा पडऩे के बाद उनकी हालत बेहद गंभीर हो गई थी। डॉक्टरों ने उन्हें अगले 24 से 48 घंटों तक अंडर ऑबजर्वेशन रखा था। जिसके बाद उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। परिजनों के अनुसार बलबीर सीनियर को 7 मई की रात तेज बुखार था। पहले उन्हें घर में ‘स्पंज बाथ’ दिया गया लेकिन जब सुधार नहीं हुआ तो उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। करीब डेढ़ साल पहले भी बलबीर सिंह सीनियर पी.जी.आई. में 108 दिन भर्ती रहे थे। यहां उनका निमोनिया के लिए उपचार चल रहा था।

बलबीर सिंह ने पहली बार भारतीय टीम की कमान इस ओलंपिक में संभाली थी। अफगानिस्तान के खिलाफ पहले ही मैच में उन्होंने 5 गोल किए लेकिन उस मैच में बलबीर सिंह चोटिल हो गए थे। जिसके बाद ओलंपिक में भारतीय टीम के उपकप्तान रणधीर सिंह जेंटल को कमान सौपी गई। चोट के कारण बलबीर सिंह सीनियर को गु्रप मैच छोडऩे पड़े पर वह फिर से सैमीफाइनल में नजर आए और फाइनल में भी खेले। यह पहला मौका था जब भारतीय हॉकी टीम ने बलबीर सिंह की कप्तानी में गोल्ड मैडल जीता था। बलबीर सिंह को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार 1948 में लंदन में हुए समर ओलंपिक में देखा गया। अर्जेंटीना के खिलाफ इस मैच में एक अजूबा देखने को मिला। बलबीर सिंह ने अपने अंतर्राष्ट्रीय पदार्पण और ओलंपिक पदार्पण में ही 6 गोल कर डाले जिसमें एक हैट्रिक भी शामिल थी।

भारतीय हॉकी टीम 9-1 से मुकाबला जीती। उन्होंने इस ओलंपिक का आखिरी और फाइनल मैच भी खेला। यह मुकाबला भारत और ब्रिटेन के बीच पहला ओलंपिक मुकाबला था जिसे भारत ने 4-0 से जीता था। बलबीर सिंह सीनियर ने इस मैच में शुरुआती 2 गोल करके भारतीय टीम के पहले ओलंपिक हॉकी के गोल्ड मैडल की जीत की नीव रखी। 1952 में फिर एक बार भारतीय हॉकी टीम हेलसिंकी पहुंची। इस बार बलबीर सिंह टीम के उपकप्तान थे और टीम की कमान के.डी.सिंह के हाथों में थी। बलबीर सिंह को उस ओलंपिक के उद्घाटन समारोह में भारत का झंडा फहराने की जिम्मेदारी दी गई थी। बलबीर सिंह दोसांझ ने ब्रिटेन के खिलाफ सैमीफाइनल में जबरदस्त हैट्रिक लगाई थी। फाइनल में उन्होंने नीदरलैंड के खिलाफ 5 गोल किए थे जिसमें एक हैट्रिक भी थी।

इसके साथ ही ओलंपिक फाइनल में सबसे ज्यादा व्यक्तिगत गोल मारने का रिकॉर्ड उन्होंने अपने नाम किया था। इसके पहले ये रिकॉर्ड ब्रिटेन के रेग्गि प्राइडमोर के नाम था। हेलसिंकी ओलंपिक में भारत के कुल13 गोल थे जिसमें से 9 गोल बलबीर सिंह ने किए थे। जो किसी भी खिलाडी का उस ओलंपिक में सर्वाधिक स्कोर था। बलबीर सिंह 1958 में जारी एक स्टांप टिकट पर नजर आए थे। इसे डोमिनिकन गणराज्य ने 1956 में मेलबर्न ओलंपिक मनाने के लिए चलाया था। वल्र्ड कप 1971में ब्रॉन्ज और 1975 में गोल्ड जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के मुख्य कोच भी थे। सन 1982 में बलबीर सिंह ने नई दिल्ली में हुई एशियन गेम्स में मशाल जलाकर खेलों की शुरुआत कराई थी।

2006 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ सिख हॉकी खिलाड़ी का नाम दिया गया लेकिन अपने उन्होंने इसे धर्म निरपेक्ष बताकर उस अवार्ड को लेने से मना कर दिया था। उन्होंने कहा था कि वे धर्म के आधार पर खिलाडियों में शामिल नहीं होना चाहते पर फिर बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि इससे भारतीय हॉकी का प्रचार होगा। सन 1982 में इन्हें सदी का सबसे बेहतरीन खिलाडी बताया गया और 2015 में इन्हें मेजर ध्यानचंद लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से नवाजा गया। बलबीर सिंह सीनियर ने सन 1946 में शादी की थी। उनकी पत्नी सुशीला लाहौर के एक छोटे से गांव से थी। दोनों की एक बेटी है जिसका नाम सुखबीर है। बलबीर सिंह सीनियर के पिताजी दिलीप सिंह दोसांझ एक स्वतंत्रता सेनानी थे।

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